जब आईने में खुद को देखना लोगों के लिए जादू बन गया: जानिए आईने की केमिस्ट्री!
आधुनिक आईने का आविष्कार 1835 में जर्मन के मशहूर केमिस्ट जस्टस वॉन लिबिग ने किया था। आइए आज हम जिस आईने में खुद को देखते हैं, उस आईने की केमिस्ट्री समझते हैं। पुराने समय में कांच के पीछे पारा और टिन का मिक्सचर लगाया जाता था। लेकिन Liebig ने काँच की पिछली सतह पर रासायनिक प्रक्रिया द्वारा metallic silver की पतली परत जमा करने की प्रभावी विधि विकसित की, जिसे silvering कहा जाने लगा।
लिबिग ने सिल्वर नाइट्रेट (AgNO₃) और अमोनिया (NH₃) का एक लिक्विड सॉल्यूशन बनाया। जब इस घोल को कांच पर डाला गया और चीनी जैसे reducing agents, जैसे lactose, का प्रयोग किया। तो एक रासायनिक प्रतिक्रिया हुई। इस रिएक्शन की वजह से सिल्वर नाइट्रेट में से असली चांदी अलग हो गई और कांच के पीछे एक बहुत ही पतली और चमकदार परत के रूप में चिपक गई। जब इस चांदी की परत के ऊपर पेंट की कोटिंग कर दी गई, तो तैयार हुआ वह आईना जिसमें चेहरा एकदम साफ दिखता है।
1835 से पहले जो कांच के आईने बनते थे, उनमें पारे का इस्तेमाल होता था। पारा एक बहुत ही जहरीला मेटल है। जो मजदूर आईना बनाते थे, वे पारे की जहरीली गैसों की वजह से धीरे-धीरे बीमार होकर मर जाते थे। इसके अलावा, वे आईने बहुत महंगे होते थे और सिर्फ राजा-महाराजा या अमीर लोग ही उन्हें खरीद पाते थे। जस्टस वॉन लिबिग एक ऐसे केमिस्ट थे जो विज्ञान को इंसानों के काम लाना चाहते थे। उन्होंने सोचा कि क्यों न कोई ऐसा तरीका निकाला जाए जिससे मजदूरों की जान भी बच सके और एक आम इंसान भी अपना असली चेहरा देख सके। इसी रिसर्च के दौरान उन्होंने कांच पर चांदी की परत चढ़ाने की यह 'केमिकल ट्रिक' खोज निकाली।
जब लिबिग ने यह चमचमाता आईना बनाया, तो शुरुआत में लोगों को इस पर यकीन ही नहीं हो रहा था। लिबिग के शुरुआती आईनों में कांच की क्वालिटी के कारण थोड़ी हरी-पीली चमक (Reflection) आती थी। उस दौर में लोग केवल पानी में अपनी हिलती-डुलती परछाई देखने के आदी थे, इसलिए आईने में खुद को इतनी साफ और सजीव स्थिति में देखना उनके लिए किसी जादू या भूतिया अनुभव जैसा था!
आज mirror manufacturing में silver के साथ-साथ aluminum की vacuum-deposited coatings भी इस्तेमाल होती हैं। खासकर कई optical और specialty mirrors में aluminum coating का उपयोग किया जाता है। फैक्ट्रियों में चांदी की जगह एल्युमिनियम (Aluminum) की पतली परत को वैक्यूम प्रोसेस के जरिए कांच पर चढ़ाया जाता है। इसी वजह से आज आईने इतने सस्ते हैं कि हर घर में मौजूद हैं। लिबिग ने जब 1835 में चांदी की परत वाला सुरक्षित तरीका खोजा, तो उनका मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि उन मजदूरों की जान बचाना था। लिबिग ने इस तकनीक के व्यावसायिक उपयोग का प्रयास किया, लेकिन यह व्यवसाय सफल नहीं हो सका। क्योंकि उस वक्त बाजार में पारे वाले आईने बनाने वालों का दबदबा था। लिबिग जब तक जिंदा रहे, दुनिया ने उनके इस तरीके को पूरी तरह नहीं अपनाया। लेकिन उनकी मौत के कुछ सालों बाद समय के साथ mercury के स्वास्थ्य-जोखिमों की बेहतर समझ और regulatory restrictions बढ़ने के कारण silvering जैसी सुरक्षित विधियों का महत्व बढ़ता गया।
आज जब भी हम आईने में अपना चेहरा देखते हैं, तो अनजाने में ही सही, लिबिग के उसी सुरक्षित विजन को देख रहे होते हैं।
सुशी सक्सेना
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