क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं?
स्वतंत्रता केवल एक शब्द नहीं, बल्कि
यह तो निर्भय होकर जीने का नाम है,
भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने,
और सच को सच कहने का मुकाम है।
26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस हमारे देश का एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व है। इस अवसर पर अक्सर मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि, *"क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं?"*
स्वतंत्रता का अर्थ केवल एक विदेशी शक्ति को देश से बाहर निकालना नहीं था, बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ हर व्यक्ति को समानता, न्याय और सम्मान मिले। हर साल 26 जनवरी हमें याद दिलाती है कि संविधान ने हमें अधिकार तो दिए हैं, लेकिन उन अधिकारों की रक्षा करना और समाज को बुराइयों से मुक्त करना हम नागरिकों का कर्तव्य है। हम "पूरी तरह से स्वतंत्र" तब कहलाएंगे जब देश का अंतिम व्यक्ति भी अभावों से मुक्त होगा। अत: *"स्वतंत्रता का अर्थ वह जिम्मेदारी है, जिसे हम अपने देश और समाज के प्रति निभाते हैं।"*
हर साल 26 जनवरी को हम बड़े गर्व के साथ मनाते हैं। 15 अगस्त 1947 को हमें ब्रिटिश शासन से 'आजादी' मिली थी, लेकिन 26 जनवरी 1950 को हमारा अपना 'संविधान' लागू हुआ, जिसने हमें एक पूर्ण गणतंत्र बनाया। लेकिन क्या आज, आजादी के इतने दशकों बाद, हम गर्व से कह सकते हैं कि हम हर मायने में स्वतंत्र हैं?
*स्वतंत्रता के तीन पहलू*
स्वतंत्रता को हम तीन नजरियों से देख सकते हैं--
राजनैतिक, सामाजिक और मानसिक
1. राजनैतिक स्वतंत्रता: इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, वोट देने का अधिकार है और अपनी सरकार चुनने की शक्ति है। इस दृष्टि से हम पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
2. सामाजिक और वैचारिक स्वतंत्रता: असली सवाल यहाँ खड़ा होता है। क्या हम आज भी गरीबी, भ्रष्टाचार, जातिवाद और भेदभाव की बेड़ियों से मुक्त हो पाए हैं? क्या एक आम नागरिक बिना किसी डर के अपनी बात रख पाता है?
3. मानसिक स्वतंत्रता: हम अक्सर पश्चिमी संस्कृति की अंधी नकल करने या संकीर्ण विचारधाराओं में बंधे रहने को ही स्वतंत्रता मान लेते हैं, जबकि असली स्वतंत्रता विचारों की स्पष्टता में है।
*स्वतंत्रता के मार्ग में बाधाएँ*
आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसी कुरीतियाँ हैं जो हमारी स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं----
1. अशिक्षा और बेरोजगारी: जब तक एक युवा के पास रोजगार नहीं है और बच्चा शिक्षा से वंचित है, तब तक वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकता।
2. सुरक्षा की चिंता: यदि देश की बेटियाँ रात में बाहर निकलते समय सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, तो हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता अभी भी अधूरी है।
सुशी सक्सेना, इंदौर मध्यप्रदेश
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