किचन से कॉर्पोरेट तक
हिंदी कथा-साहित्य की उन महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल है, जो जीवन के साधारण दिखने वाले प्रसंगों के भीतर छिपे असाधारण यथार्थ को उजागर करती हैं। रीना धीमान 'स्वर्ण' द्वारा रचित तथा प्रतीक पब्लिकेशन से प्रकाशित यह कथा-संग्रह लगभग चालीस लघुकथाओं और कहानियों का सुंदर संकलन है। अस्सी पृष्ठों में समाहित यह पुस्तक आकार में भले संक्षिप्त हो, किंतु अपने कथ्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों में अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली है।
रीना धीमान ‘स्वर्ण’ की कहानियाँ सीधे जीवन से उठाई गई प्रतीत होती हैं। इनमें कृत्रिमता नहीं, बल्कि अनुभवों की सच्चाई और समाज के बदलते स्वरूप पर तीखा किंतु संतुलित व्यंग्य मौजूद है। लेखिका ने विशेष रूप से नारी जीवन के विविध पक्षों—उसकी पीड़ा, संघर्ष, आत्मसम्मान, प्रेम, विवशता, आत्मनिर्भरता और मौन विद्रोह—को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। यही कारण है कि यह संग्रह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि पाठक को भीतर तक सोचने के लिए विवश करता है।
“विकल्प” कहानी में आधुनिक संबंधों की विडंबना पर लेखिका का करारा कटाक्ष अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ा है। माँ के शब्द—
“कुछ नहीं देगा तुम्हारा लिविंग तुम्हें… देगा तो बस समझौता और मनमर्जियाँ…”
आज के बदलते पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों पर गहरी टिप्पणी करते हैं। यह कथा केवल संबंधों की अस्थिरता नहीं, बल्कि भावनात्मक का भी चित्र प्रस्तुत करती है।
“खामोशी” में प्रतीक्षा करती स्त्री का मौन दर्द पाठक को द्रवित कर देता है। पति के लौट आने की आशा में जीती नारी की चुप्पी यहाँ शब्दों से अधिक मुखर हो उठती है। इसी प्रकार “हमारा कमरा” में स्त्री-पुरुषू संबंधों का अंतर्द्वंद्व अत्यंत मार्मिकता से चित्रित हुआ है, जहाँ पुरुष अपनी भूलों का भार भी स्त्री के हिस्से में डाल देता है। लेखिका ने नारी मन की घुटन, असुरक्षा और प्रेम की जटिलताओं को बड़ी सहजता से उकेरा है।
इस संग्रह की विशेषता इसकी विषय-विविधता भी है। “पर्दा”, “काश”, “चटपटी चटनी”, “अवसर”, “महिला दिवस”, “निर्णय”, “गलती”, “डिजिटल धोखे”, “वैदेही”, “विसर्जन”, “व्यवस्था” जैसी कहानियाँ समाज के अलग-अलग चेहरों को सामने लाती हैं। कहीं व्यंग्य है, कहीं करुणा, कहीं सामाजिक विसंगतियों पर चोट, तो कहीं रिश्तों की ऊष्मा और टूटन का चित्रण। लेखिका की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावोत्पादक है, जिससे पाठक सहज ही कथाओं से जुड़ जाता है।
विशेष रूप से “लीची” कहानी मन को छू लेने वाली रचना है। विदेश में रह रही एक युवती जब अपने गाँव लौटती है और मिट्टी की सोंधी गंध में अपना भविष्य खोजती है, तब कहानी केवल गाँव-प्रेम नहीं रह जाती, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने की गहरी मानवीय आकांक्षा बन जाती है। उसका यह कहना—कि वह अपने पिता की स्मृति में ऑर्गेनिक खेती करेगी—नई पीढ़ी के भीतर पल रहे सांस्कृतिक जुड़ाव और आत्मीयता को सुंदर रूप में अभिव्यक्त करता है।
बालमन की कोमल कल्पनाओं को समेटे “चाँद पर राघव” इस संग्रह की अत्यंत प्यारी बाल-कथा है। राघव के सपनों, उसकी मासूम जिज्ञासाओं और चाँद से संवाद के माध्यम से लेखिका ने बच्चों की कल्पना-शक्ति को सुंदर अभिव्यक्ति दी है। यह कहानी संग्रह के गंभीर वातावरण में एक मधुरत और निश्छल मुस्कान की तरह उपस्थित होती है।
संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इसकी कहानियाँ छोटी होते हुए भी गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। वे अनावश्यक विस्तार में नहीं उलझतीं, बल्कि सीधे हृदय और चेतना को स्पर्श करती हैं। प्रत्येक कथा अपने भीतर एक प्रश्न, एक संवेदना और एक विचार छोड़ जाती है। यही सफल लघुकथा की पहचान भी है।
कुल मिलाकर किचन से कॉर्पोरेट तक समकालीन हिंदी कथा-साहित्य का एक सशक्त और संवेदनशील संग्रह है, जिसमें नारी-विमर्श, सामाजिक यथार्थ, बदलते रिश्ते, आधुनिक जीवन की विडंबनाएँ और मानवीय संवेदनाएँ अत्यंत प्रभावी ढंग से उभरकर सामने आती हैं। रीना धीमान 'स्वर्ण' की लेखनी में सहजता भी है और सामाजिक चेतना भी। यह संग्रह पाठकों को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है।
लेखिका को इस उत्कृष्ट कृति के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है कि वे अपनी संवेदनशील और सशक्त लेखनी से हिंदी साहित्य को इसी प्रकार समृद्ध करती रहेंगी।
अलका पांडेय मुंबई
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