छात्रों ने शिक्षा, बेरोज़गारी, छात्रवृत्ति, फीस, भर्ती और भविष्य का सवाल उठाया—
तो उन सवालों का जवाब मत दीजिए।
बस बहस का विषय बदल दीजिए।
कहिए कि भाषा ठीक नहीं थी,
कहिए कि व्यवहार अनुचित था,
कहिए कि विरोध का तरीका गलत था।
और देखते-देखते असली मुद्दा चर्चा से गायब हो जाएगा।
राम मंदिर के चढ़ावे के प्रबंधन या कथित अनियमितताओं पर सवाल उठें—
तो उन सवालों पर तथ्य मत रखिए।
ध्यान कहीं और मोड़ दीजिए।
संसद के बाहर हुए किसी नुक्कड़ नाटक, किसी नारे, किसी बयान या किसी विवाद को दिन-रात बहस का केंद्र बना दीजिए।
जब बहस भटकती है, तो जवाबदेही भी पीछे छूट जाती है।
लोकतंत्र में असहमति पर बहस हो सकती है,
विरोध के तरीकों पर भी चर्चा हो सकती है,
लेकिन यदि हर बार मूल प्रश्नों को छोड़कर केवल शोर पर ध्यान दिया जाए,
तो समाधान नहीं, केवल ध्रुवीकरण बढ़ता है।
इसलिए खेल को पहचानिए।
समाचार और शोर में अंतर समझिए।
व्यक्ति नहीं, मुद्दे पर टिकिए।
भावनाओं से पहले तथ्यों को परखिए।
क्योंकि लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब सत्ता से भी सवाल हों, विपक्ष से भी सवाल हों, और जनता की नज़र सबसे पहले मुद्दों पर टिकी रहे—न कि भटकाने वाली बहसों पर।
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कविता